#364. "माँ की ममता और गरीबी का आलम "

बहुत दिनों से भूका था में।
मुझे आज बहुत भूक सता रही थी॥

सिर्फ एक निवाले को।
मेरे पेट में चुहिया तबाही मचा रही थी॥
मैं माँ के पास गया और बोला- “माँ भूक लगी है” ।




माँ मुझे सीने से लगा आँसू बहा रही थी॥

माँ बोली – “रुक में तेरे लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनती हूँ ।
फिर माँ लडखडाते कदम के साथ रसोई में जा रही थी॥
माँ को रसोई में जाता देख मेरा दिल हर्षित हो उठा।
क्युकी माँ मेरे लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनाने जा रही थी॥
चूल्हे पर रखकर बर्तन।
माँ उसमे पानी चढ़ा रही थी॥
बर्तन में माँ करछी को बड़ी जोर से चला रही थी।
शायद आज माँ कुछ ख़ास बना रही थी॥
सिसकियों भरी आवाज़ में पूछकर मुझसे मेरी भूक का हाल।
माँ एक मीठा सा गाना गुन-गुना रही थी॥
मेरी आँखें अब कुछ भारी सी होती जा रही थी।
शायद भूक के उपर माँ की मीठी लोरी भारी होती जा रही थी॥
मैं सो गया भूके पेट ही।
माँ मुझे देख आँसू बहा रही थी॥
घर में तो एक दाना नही था भोजन बनाने के लिए।
माँ तो बस खाली बर्तन में करछी चला रही थी॥
चूमकर बार-बार गाल मेरे माँ मुझे अपने सीने से लगा रही थी।




अश्कों भरे स्वर में माँ मुझसे माफ़ी मांगती जा रही थी॥

खिलाना तो वो मुझे बहुत कुछ चाहती थी।
पर आज फिर गरीबी माँ की ममता से जीतती जा रही थी॥
माँ के आंसुओं से भी नही पिघला दिल उस भगवान का।
शायद इसलिए उसे माँ की विनती सुनाई नही आ रही थी ॥
गरीबी दे तू पर भूके पेट न सुला किसी को।
माँ बस पत्थर के सामने ये कहती जा रही थी॥
<3 मयंक <3

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