#370. माना की हार मिली है, एक नही कई बार मिली है॥

आए थे बड़ी आशाओं के साथ।

जा रहे हैं निराशाओं के साथ॥

उम्मीद थी की जीत जाऊंगा में।

पर क्या पता था फिर हार जाऊंगा में॥

माना की हार मिली है।

एक नही कई बार मिली है॥

लक्ष्य के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए।

ठोकरे मुझे हाजार मिली है॥

कई बार फटकार मिली है।

ज़िल्लतें मुझे हर बार मिली है॥

आपनो से हुई है झड़प।

कई बार फटकार मिली है।

अलग अलग लोग मिले है।

अलग अलग राय मिली है॥

कोई कहता है तू छोड़ दे उम्मीद।

किसी से राह बदलने की सलाह मिली है॥

कुछ से प्रोत्साहन।

पर सबसे तो मुर्ख है की उपाधि मिली है।।

गिरा हूँ

संभला हूँ॥

फिसला हूँ।

पिछड़ा हूँ॥

पर फिर संभला हूँ।।

फिर आगे बढ़ा हूँ॥

माना की हार मिली है।

एक नही कई बार मिली है॥

पर हार कभी न मानूंगा में।

हर बार गिरकर उठूँगा में॥

अपना लक्ष्य पाके दिखाऊंगा में।

अपना नाम दुनिया में चम्काऊंगा में॥
©मयंक

0 thoughts on “#370. माना की हार मिली है, एक नही कई बार मिली है॥”

  1. Aapne iss baat ko bhot ache se likha ha.
    Haarte rehte ha, per harr nahi maane chaiye. Ek din toh kaamyabi zarur milege.
    Woh Harivansh Rai Bachan ji ke kavita hai n :
    नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
    चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
    मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
    चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
    आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

    Keep writing. And don’t lose hope. Best wishes.
    – Kritika 🙂

    1. thankss 🙂
      apko jb tk thokr nhi lgti raaste me tb tk apko kathinaiyon ka pta nhi chlta,,,,haar to ek rukawt h ya fir me khu ek choti si baadha h jo ake or apki manzil ke beech me aati h,,,us rukawt ko paar krke apko manzil ko paana hota h.. 🙂
      nd once again thanks for us wishes 🙂

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