#377. ।।काश एक बहन मेरी भी होती।।

वो स्नेह वो प्यार, वो एक बहन का दुलार ।
किस से मांगू मैं वो बहन का प्यार ॥
हर आँगन मैं देखा है मैंने हर किसी की बहन को ।
सिर्फ मेरे ही आँगन मैं सन्नाटा पसरा है ॥
खुश नसीब होते होंगे वो जिन्हें बहन से प्यार मिलता है ।
मैं तो अकेला हूँ ॥
होता ये सब कुछ ।
काश एक बहन मेरी भी होती ॥
दो चार बातें कर लिया करता ।
थोडा हंस थोडा रो लिया करता,
कभी थक कर उसकी गोद मैं सो लिया करता ।
होता ये सब कुछ,
काश एक बहन मेरी भी होती ॥
थोडा मस्ती करते,
थोडा लड़ते झगड़ते ।
वो एक दूसरे से रूठते,
एक दुसरे को मानते,
एक दुसरे के कान पकड़वा माफ़ी मंगवाते॥
होता ये सब कुछ ।
काश एक बहन मेरी भी होती ॥
जब भी करता मैं कोई गलती, तो वो मेरे सामने आकर माँ से लड़ती ।
मेरी गलती को अपने सर लेकर, मेरी पैरवी करती ,
किसी काम को करवाने को पिता जी से इजाजत दिलाती ॥
होता ये सब कुछ ।
काश एक बहन मेरी भी होती ॥
आता रक्षा बंधन का त्यौहार,
वो रहती भूकी मेरे वास्ते,
वो राखी बाँध हाथ मैं मेरे, मुझसे मांगती उपहार ।
मैं उससे करके मज़ाक, कहता इस बार नहीं अगली बार ॥
वो रूठकर मुझसे अपने कमरे मैं चली जाती,
माँ से डांट मेरी पड़ती ।
मानाने को उसे मैं देता कई उपहार,
क्योंकि मेरी बहन की ख़ुशी के आगे, फीका है सारा संसार ॥
होता ये सब कुछ ।
काश एक बहन मेरी भी होती ॥
करता मैं उसके हर शौक पूरे,
रहने न देता मैं उसके कोई सपने अधूरे ।
रखता मैं उसे अपनी पलकों पर बिठाकर,
गम मैं रोता मैं उसे सीने से लगाकर ॥
होता ये सब कुछ ।
काश एक बहन मेरी भी होती ॥
होती उसकी भी शादी की बात,
लड़के वाले मांगने आते उसका हाथ ।
वो थोडा हस्ती थोडा शर्माती,
लड़का केसा लगा मुझे बताती ॥
होता ये सब कुछ ।
काश एक बहन मेरी भी होती ॥
शादी मैं उसकी मैं नाचता सारी रात,
सबसे आगे खड़ा होता स्वागत को,जब दूल्हा लेकर आता बारात ।
शादी करवाता मैं धूम धाम से,
होता ऐसा मिलन जेसे सीता मिली हो राम से ॥
होता ये सब कुछ ।
काश एक बहन मेरी भी होती ॥
वर-माला के समय उठाता मैं उसे सबसे ऊपर,
दूल्हा भी हार मान कर कहता -“साले साहब अब होने तो दो ये स्वयंवर” ।
मंगल सूत्र गले मैं उसके पडता, ख़ुशी मुझे होती ॥
होता ये सब कुछ ।
काश एक बहन मेरी भी होती ॥
आता पल विदाई का,
मैं खुद को करके बंद एक कमरे मैं रोता ।
बहन आती ढूंढती हुई,
मैं खुद को संभाल कर बोलता -“चल पगली रोते नहीं ये तो ख़ुशी का मौका है” ॥
वो मेरे गले लग कर कहती -“अपना ख्याल रखना, तेरी शैतानियों को अपने सर लेने वाली अब मैं तेरे साथ नहीं रहूंगी ।
भैया जब भी तेरी याद आएगी मैं खूब रोऊंगी” ॥
फिर माँ आकर कहती-
“चलो पल आया है विदाई का”
वो फिर तुझे गोदी मैं उठाकर मैं ले जाता,
दूल्हे के साथ तुझे बिठाता ।
तू हाथ दूल्हे का छोड़ फिर वापस आती,
मुझे गले लगाकर कहती-“भैया इन्हें जाने दो मैं इनके साथ नहीं जाती” ॥
मैं कहता-“देख पगली ये तो विधाता का लिखा नियम है,
लड़की हमेशा से पराया धन है” ।
करवाकर तेरी विदाई मैं खूब रोता ॥
होता ये सब कुछ ।
काश एक बहन मेरी भी होती ॥
वो ससुराल से तू आती,
अपने साथ ढेरों खुशियाँ लाती ।
मैं खुश होता तुझे गले लगाकर,
मुझे मेरी जन्नत मिल जाती ॥
होता ये सब कुछ ।
काश एक बहन मेरी भी होती ॥
<3 ©मयंक <3

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