#378. मैं और मेरी काल्पनिक मोहब्बत।

कोरा कागज़ है सामने ।
तेरी एक तस्वीर बनाना चाहता हूँ ॥
मेरी आँखों की गहराई से निकालकर ।
तुझे पन्ने पर उतरना चाहता हूँ  ॥
किसी को खबर नही, की है कोन तू ।
सारी दुनिया को तेरा दीवाना बनाना चाहता हूँ ॥
सब पूछते है मेरी कलम के जादू का राज़ ।
मैं उस राज़ से पर्दा उठाना चाहता हूँ ॥
मैं दुनिया वालों को तुझसे मिलवाना चाहता हूँ ।
सब डूबे है मेरी कलम के समुन्द्र में ।
मेरी कश्ती किसके दरिया में है,
मैं वो दरिया दिखाना चाहता हूँ ॥
माना दुनिया के लिए तेरा कोई अस्तित्व नही,
तू इस दुनिया की नही,
तेरा कोई नाम नही,
तेरा कोई स्वरुप नही,
तुझमे जान नही,
तेरी कोई पहचान नही,
तू ही मेरी प्रेरणा है,
भले ही इससे दुनिया अनजान सही ॥
मैं हर वहम आज दूसरों का मिटाना चाहता हूँ ।
मैं दुनिया से तुझे मिलाना चाहता हूँ ॥
लोगों ने की है यंहा चेहरे से मोहब्बतें ।
जिसका कोई चेहरा नही, मैं अपनी उस मोहब्बत से सबको मिलाना चाहता हूँ ॥
कोरा कागज़ है सामने ।
तेरी एक तस्वीर बनाना चाहता हूँ ॥
मेरी आँखों की गहराई से निकालकर ।
तुझे पन्ने पर उतरना चाहता हूँ  ॥
<3 ©मयंक <3

0 thoughts on “#378. मैं और मेरी काल्पनिक मोहब्बत।”

  1. Sabd nahi ha batane ko ke yeh mujhe kitne pasand aaye.
    “लोगों ने की है यंहा चेहरे से मोहब्बतें ।
    जिसका कोई चेहरा नही, मैं अपनी उस मोहब्बत से सबको मिलाना चाहता हूँ ॥” <3
    Beautiful 🙂

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