#382. एक तरफ़ा मोहब्बत ॥

मेरी एक तरफ़ा मोहब्बत,
मेरा एक तरफ़ा प्यार था।
उससे मोहब्बत का जूनून मेरे सर पर सवार था॥
उसे न मुझसे मोहब्बत थी न,
मुझसे प्यार था॥
सुबह होती थी उसके मीठे ख़्वाबों के साथ,
फिर आईने पर रोज़ इज़हार होता था।
आईने में वो दिखती थी,
कैसा लग रहा हूँ सवाल मेरा उससे होता था,
आज इज़हार करुंगा ये फैसला कर मैं तैयार होता था॥
रहती थी वो सामने घर के मेरे,
छत्त पर रोज़ होता था इंतज़ार उसका।
फिर ढ़लती शाम में उसक दीदार होता था॥
देख उसे सामने अपने,
मैं खो जाता था ख़्वाबों मैं।
मेरे साथ हो रहा था वैसा,
जैसा लिखा था मोहब्बत की किताबों मैं॥
फिर कुछ बातें होती थी,
कुछ हंसी मजाक के पल
कुछ इधर उधर की बातें,
और रोज़ की हसीं मुलाकातें॥
वो छत्त से उतरने को मुड़ती थी,
यंहा धड़कने बढती थी।
क्युकी इज़हार करने की इच्छा मन्न में उमड़ती थी,
उसे लगाकर आवाज़ मैं इज़हार करने का खुद से फैसला करता था॥
वो मुडकर पूछती थी “बात क्या है”,
रोज़ की तरह आज भी – ” कुछ नहीं ” कहना है, या फिर आज कुछ नया है।
खुद से कर वादा अगले दिन का, मैं आज इज़हार का फैसला टाल देता था,
कहकर- “कुछ नहीं ” हम अपनी धडकनों को सम्भाल लेता था॥
दिन गुजरता था दीदार में उसके,
फिर बारी रात की आती थी,
उससे केसे करूं इज़हार ये बात मुझे सताती थी।
मैं पलकें बंद करता था तो तस्वीर उसकी नजर आती थी॥
दिन बीते,
महीने बीते,
साल बदला,
ये मौसम बदले,
नही बदला तो वो था-
मेरा इंतज़ार,
मेरा इज़हार,
मेरी मोहब्बत,
मेरा प्यार॥
आज वो मेरे दरवाज़े पर आई,
उसने आवाज़ लगाई।
मेने दरवाज़ा खोला,
“क्या काम है ” उससे बोला॥
वो बोली- “अरे बाबा सब बताती हूँ”
बात क्या है, ये मैं तुम्हे समझती हूँ,
कुछ दिन बाद मेरी शादी है,
मैं तुम्हे न्योता देने आई हूँ।
बात उसकी सुन मेरे नीचे से ज़मीन खिसक गई,
मैं कुछ बोल ना सका, मेरी सांस अटक गई॥
मैं खामोश था,
आँखें भरी थी।
ये सपना था या सच,
ना जाने ये कैसी घडी थी॥
उसकी बात सुन्न मैं संभल न सका।
इज़हार करना चाहता था,
पर मुख से कुछ निकल न सका॥
अगले ही पल आँखों के सामने अँधेरा छा गया,
मानो मेरा अंतिम समय आ गया ।
कुछ ही पल में मैं होश खो बेठा,
आँखें खुली तो पाया, मैं अस्पताल में था लेटा॥
मेरा समय निकट था,
इज़हार का आखरी मौका।
उठा कागज़ कलम,
फिर मेने खुद को नही रोका॥
मैं कागज़ पर लिखता रहा,
मेरी पलकों से समुन्दर बहता रहा।
मैं जो लिखता वो मिट जाता था,
क्यूंकि आंसूं का पर्दा सिहाई पर चढ़ जाता था॥
इस आंसू और सिहाई की जंग में जीत आंसू की हुई,
पन्ना कोरा रहा,
इज़हार अधुरा रहा,
अरमान दिल में दबे रहे,
मेरा समय पूरा हुआ॥
फिर ये साँसे भी रुक गई,
मेरी अधूरी मोहब्बत कोरे कागज़ के कफ़न में दफ़न हो गई॥
मेरी अधूरी मोहब्बत कोरे कागज़ के कफ़न में दफ़न हो गई॥
मेरी अधूरी मोहब्बत कोरे कागज़ के कफ़न में दफ़न हो गई॥

0 thoughts on “#382. एक तरफ़ा मोहब्बत ॥”

  1. दिल निकाल के पन्नों पे रख दिया है शानदार रचना के लिए बधाई

Leave a Reply