#390. ना मैं शायर हूँ, ना मैं कवी हूँ…।

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ना मैं शायर हूँ, ना मैं कवी हूँ…।
मैं शख्स-ऐ-आम हूँ, मुझे लिखने दो…॥
ना  मैं  ख़ुशी  हूँ, ना मैं गम हूँ….।
बस एक कल्पना हूँ, मुझे पन्नो पर उतरने दो…॥
ना मैं आशिक हूँ, ना मैं किसी के दिल मैं क़ैद हूँ…।
मैं  तो एक आज़ाद पंछी हूँ, मुझे खुले आस्मां मैं उड़ने दो…॥
ना किसी से चाहत है, ना किसी को चाहता हूँ….।
बस मेरी कल्पना की मोहब्बत को, हकीकत के पन्नो पर उकेरने दो…॥
ना कवी हूँ, ना मैं रवि हूँ….।
तुम मुझे मेरी कला के रंग को दुनिया में  बिखेरने दो…॥
अपने लेखन के लिए,मुझे कोई मान-सम्मान का लोभ नहीं…।
मैं तो एक मदमस्त हाथी हूँ मुझे अपनी राह पर बढ़ने दो…॥
ना किसी को रुलाना चाहता हूँ न किसी को मनाना चाहता हूँ….।
मैं तो एक दर्पण हूँ, मुझे  समाज को उसका चेहरा दिखाने दो……॥
~मयंक

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