#395. वो माँ थी…

सबको दिखी बदली फितरत मेरी ।
जिसे ना दिखी मेरी बदली फितरत, वो माँ थी ॥
सबने कहा मैं बड़ा हो चूका हूँ एक पौधे की तरह ।
पौधे में भी जिसे अपना बीज नज़र आया, वो माँ थी ॥
सबको दिखा मेरा मंजिल पर पहुचना ।
जिसको दिखे मेरी राह में चुभते पत्थर, वो माँ थी ॥
सबको दिखा औदा मेरा ।
जिसे दिखे पैरों में छाले, वो माँ थी ॥
लड़खडाए कदम,
भटका राह से,
भटकाने वाले बहुत मिले ।
संभाला जिसने,
जिसने सहारा दिया,
सही राह दिखाई, वो माँ थी ॥
बचपन में बीमार पड़ा,
जिससे मेरा दर्द देखा ना गया ।
वो सारी रात जागे,
पट्टी बदले,
मेरे सिसकने का दर्द जिसके दिल को चुभे, वो माँ थी ॥
वक़्त अच्छा था, तो सब साथ थे ।
बुरे वक़्त में जो थी साथ खड़ी, वो माँ थी ॥
बचपन हो या जवानी,
थकान खेल-कूद की हो या काम की ।
जिसके आँचल में खोकर मिलता था आराम वो माँ थी ॥
सबने मांगी प्रभु से अपनी कामयाबी की दुआएं ।
जिसने मांगी दुआएं सिर्फ मेरे लिए, वो माँ थी ॥
<3 मयंक <3
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सिर्फ इतना कहना चाहूँगा आप सबसे….
बचपन में आपकी नादानियों को माँ ने हमेसा माफ़ किया, आज भी वो माफ़ करती है….
सारी उम्र वो आपका सहारा बनी है, बुढ़ापे में उसका सहारा जरूर बने….
सभी माताओं को मेरा (पुत्र- “मयंक” ) का चरणस्पर्श प्रणाम ॥

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