#403. सत्य बुढ़ापे का.. ( Satya Budhape Ka )

सुबह का वक़्त था,
ठन्डी हवाओं के झोंके ।
हसीं मौसम,
इस फिजा में खोने से खुद को कौन रोके ॥
लोग अपने अपने घरों से निकल रहे थे…
कुछ व्यायम कर रहे थे ।
तो कुछ टहल रहे थे ॥
एक शख्स दिखा कुछ बुजुर्ग सा…
उम्र जवाब दे चुकी थी उसकी,
पर इरादों में दम उसके अभी भी बाकी था ।
पैर जवाब दे गए थे,
लाठी ही उसकी अब साथी थी ॥
उस बुजुर्ग को देख दया और जिज्ञासा के भाव जागे ।
मैं जंहा था, वही ठहर गया,
इस सोच में की क्या होता है आगे ॥
वो चलता,
फिर रुकता ।
सांस उखड्ती,
वो सीने पर हाथ रखता ॥
एक कदम चलता,
दो पल रुकता ॥
कंप-कम्पते हाथों से लाठी को आगे बढ़ाता ।
लोग अपनी धुन में खोए थे,
वो भी लोगों के साथ ताल से ताल मिलाने की कोशिश करता ॥
इस कोशिश में उसकी लाठी डगमगा गई ।
उसका पैर फिसला,
वो गिर गया,
आवाज़ हुई,
मानो उसकी हड्डियाँ कराह गई ॥
मैं पहुंचा..
उसे उठाया,
सहरा दे, उसे बिठाया ॥
मैं बोला- बाबा, जब शरीर इतना नाजुक है, तो क्यों करते हो प्रयास चलने
का ।
शरीर जब जवाब दे चूका है, तो क्यों सोचते हो घर से निकलने का ॥
बुजुर्ग बोला- बेटा तुम दिल के नेक लगते हो,
तुम्हे मैं एक किस्सा सुनाता हूँ ।
मेरे इस प्रयास का राज़ बताता हूँ ॥
मैं था तम्हारी तरह नौजवान कभी ।
काम के समय…
भूक, थकान क्या होती है मेने जाना नही कभी ॥
मेहनत मेने ताउम्र खूब की,
उसका फल भी मिला ।
एक हंसता खेलता परिवार था मेरा ॥
मैं कमाता गया ।
अपने बच्चों पर उड़ाता गया ॥
मेने सोचा मेरी जिंदगी के आखरी समय में ये समुन्द्र का किनारा बनेंगे ।
मेरे बच्चे मेरा सहारा बनेंगे ॥
वक़्त बीतता गया,
बुढ़ापा आने लगा ।
मेरा बेटा मुझसे ज्यादा मेरी दौलत को चाहने लगा ॥
जब तक मैं काम करता था घर का मालिक मैं था ।
वक़्त जवान रहा मैं बूढा हो गया, शायद वो मेरा बुरा समय था ॥
जेसे पेड़ की उम्र हो जाने पर काट दिया जाता है ।
घर में बड़े का समय पूरा होने पर सबका हिस्सा बाँट दिया जाता है ॥
मेरे ही बेटे मी दुश्मन हो गए ।
जिससे सहारे की उम्मीद थी, वो ही सांप के फन्न हो गए ॥
मेरा क्या कसूर,की मेने उन्हें एक कुम्हार की तरह आकार दिया ।
मेरा वक़्त आने पर उन्होंने मुझे ही घर से निकाल दिया ॥
ना मेरी परवरिश में खोट था, ना मेरे स्नेह में कमी ।
बुजुर्ग अपनी आप-बीती सुना रहा था, उसकी आँखों में थी नमी ॥
वो बोला- किसी और से सहारे की उम्मीद क्या करू,जब मेरे अपनों ने
धोका दे दिया ।
बुजुर्ग ने लाठी उठाई,और वो फिर चल दिया ॥
उसके डगमगाते कदम…
उसकी लडखडाती चाल ।
वो बिन पूछे ही कर गया मुझसे एक सवाल ॥
“क्या अपने ही बेटों से सहारे की उम्मीद करना गुनाह है…..?????”

0 thoughts on “#403. सत्य बुढ़ापे का.. ( Satya Budhape Ka )”

  1. Gunah Ye Hai Ke Ziyada Umar Hona
    Is Gunah Hone se Pehle Mar Jana Acha Hai
    Kya Kare Aisi Jindagi Kisi Ke Sahare Bina
    Bhagwan Ko Pyare Hona Acha Hai
    Aisi Baat Phir Mujhe Na Kehna
    Na Deke Na Sune Yahi Sabse Acha Hai
    Shiva

    1. shiva जी जेसे एक हाथ की 5 ऊँगलीयां अलग अलग होती हैं, वेसे ही हर बेटा एक जेसा नहीं होता है। कुछ बेटे अच्छे भी होते है।

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