#456. दिल की बात…

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वो बोली…
“अरे सुनो, क्या बात आज-कल कुछ खोए-खोए से रहते हो,
मैं तुम्हे आवाज़ देती हूँ, तुम नज़रंदाज़ करते हो।
कोई खता हो गई, या बात कुछ और है,
“वो मुस्कुराई और आँख मारकर बोली”
या फिर दिल में कोई चोर है॥
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उसके मज़ाक ने मेरी चोरी पकड़ ली,
मैं नज़रें चुराकर, हड़बड़ाकर बोला-
नहीं तो, ऐसी कोई बात नही है,
जैसा तुम सोच रही हो,
वेसे मेरे दिल में कोई जज्बात नही है।
आज-कल थोड़ा व्यस्त हूँ,
इसीलिए अपने काम में मस्त हूँ॥
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वो बोली-
अच्छा ऐसी बात है, तो मुझसे नजरे मिलाने में क्यूँ कतरा रहे हो,,
और अगर इतने ही व्यस्त हो. तो बताने में क्यों इतरा रहे हो॥
उसने मेरे गाल पर हाथ रक्खा और बोली-
“इतना पसीने में क्यों भीगे हो,
बताओ बात क्या है।
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मैं उसका हाथ हटकर बोला-
“कुछ नही, बात क्या होनी है,
बस थोड़ा काम की वजह से परेशान हूँ”
वो बोली-
“लगता तो नही है,
जो तुम बोल रहे हो, उस बात का मेल तुम्हारी आँखों में दिखता तो नहीं है॥”
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मेरी धडकन तेज़ होने लगी,
शब्दों की जुबां से दुश्मनी होने लगी॥
कुछ कहने को हिम्मत जुटाता,
कुछ बोलने से पहले लड़खड़ा जाता।
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वो बोली-
“ठीक है, अगर कोई बात नहीं है तो मैं चलती हूँ”
ये कहकर उसने कदम बढाए, और वो जाने लगी..
कुछ समझ नहीं आया की क्या करू,
क्या कहूँ,
उसे कैसे रोकूँ…
रोकू तो किसलिए,,
धड़कन की रफ़्तार में इजाफा होने लगा,
मैं बेसुध हो, सवालों के जंगल में खोने लगा।
लम्बी सांस ली,
धड़कन को काबू में किया,
उसका हाथ पकड़ा और कहा- “रुको”
वो रुकी,
पीछे मुड़ी,
आँखों में अज़ब सी चमक ले, थोड़ा मुस्कुराई,
फिर बोली-
“हाँ तो, व्यस्त महाशय अब कौनसा काम याद आ गया,जो मुझे रोक लिया।”
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मैं चुप था, हिम्मत जूटा रहा था।
उसने कहा- अरे अब खड़े क्यों हो स्तम्भ की तरह, कुछ नही कहना तो मैं जाती हूँ।
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उसकी आवाज़ कानों में गूंजती सी लगी,
मानो मेरी दुनिया मुझसे अपना हाथ छूटाने लगी।
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मैं बोला-
‘सुनो, तुमसे एक बात कहनी है,’
बहुत से हैं अरमान मेरे, बहुत सी हैं चाहत।
तू इस दिल की मल्लिका है, तू बस हाँ करदे तो मिले मुझे राहत॥
तुझसे कभी मोहब्बत तो ना थी,
ना कोई दिल में ख़याल ऐसे थे।
मैं बस एक बात कहना चाहता हूँ.
कल तक था मैं एक आज़ाद पंछी,
आज मैं तेरे दिल मैं कैद होना चाहता हूँ!
तुलना नहीं करता मैं हमारी हीर-रांझा कहानी से,
पर हाँ, हमारी कहानी सबसे अलग होगी ये वादा करता हूँ।
क्या तुझे भी मुझसे मोहब्बत है….?
मेरे इस सवाल का जवाब दे,
या तो हाँ कर या फिर मुझे मार दे।”
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मेरे लबों पर उसने हाथ रख दिया, और उसकी पलकों से आँसू छलक आए।
वो बोली-
“चुप पगले, तुझसे मोहब्बत तो मुझे भी है,
पर तेरा इज़हार-ऐ-इश्क सुनने को ये कान कबसे व्याकुल थे”
दोनों आंसुओ के समुन्द्र में खो गए।
कुछ कह न पाए,
एक-दुसरे की बाहों में समाए,
और एक दुसरे में खो गए॥

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