#554. चलो-चले दुनिया की नजरों से दूर….

दुनिया की नज़रों से छिपकर,

किसी अंजान सफर पर तू और मैं निकले,

रात 3 बजे किसी ढ़ाबे पर बस जा रुके।।

सर्द रात हो,

मेरे हाथों में तेरा हाथ हो,

कुल्हड़ में चाय हो,

तेरी निगाहों से निगाह टकराई हो।।

गप-शप हो जमकर,

बस तुझे देखता रहूँ साँसे थामकर।।

फिर तू मुस्कुराए,

और बोले- अच्छी बनी है चाय।

हवा चले सरर से,

और तू ठिठुर जाए।।

तू बोले- ठण्ड लग रही है,

चलो बस में वापस चला जाए।।

😏mयंक

2 thoughts on “#554. चलो-चले दुनिया की नजरों से दूर….”

  1. भाई अगर आप रात के तीन बजे, अपनी मम्मी से बच बचाकर कैसे भी निकले और ढाबे पर पहुच गए, चाय का लुत्फ़ उठाया, प्यार के उन लम्हों में दिल ने आपके रक्स किया मगर ऐसी कोंसी बस मिल गयी जिसकी सर्विस सुबह सुबह चार बजे कि होगी…. कुछ तो गड़बड़ हैं… वैसे खूब लिखा हैं… जब इश्क परवान चढ़ता हैं… तो उसके साथ एक पल क्या सदी गुजारने का मन करता हैं….

    1. हा हा हा….
      भाई वैसे तो ये कहानी कुल्हड़ की चाय की इस Pic को देखकर पैदा हुई, पर ये कहानी कुछ यूं है कि वो दोनों रात की बस में किसी सफर पर निकले है, मान लीजिए रात 10 बजे की बस है जो delhi से चलती है और सुबह 7 बजे nainital पहुँचती है,,,,तो वो बस रात को किसी ढ़ाबे पर रूकती है कुछ देर के लिए, रात 3 बजे का सफर इसलिए चुना की तब सन्नाटा सबसे ज्यादा होता है,,,,और सही कहा….जब इश्क़ परवान चढ़ता है तब होश कँहा रहता है कि वक़्त क्या…
      और जिसे चाहो वो साथ हो, तो वो पल दुनिया का सबसे खूबसूरत लगता है।।

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